आगम की अवधारणा
आगम से आशय- आगम से आशय किसी फर्म या उत्पादक द्वारा एक वस्तु की निश्चित मात्रा की बिक्री से प्राप्त होने वाली धनराशि से होता है। एक फर्म का उद्देश्य अपने लाभ को अधिकतम करना होता है। लाभ क्योंकि उत्पादन लागत तथा बिक्री की राशि के अन्तर के बराबर होता है, इसलिए फर्म अपनी लागत को न्यूनतम तथा बिक्री की राशि या आगम को अधिकतम करने का प्रयास करती है। लागत दी होने पर लाभ की मात्रा आगम पर निर्भर करेगी, अतः आगम जितना अधिक होगा लाभ भी उतना ही अधिक होगा।
आर्थिक विश्लेषण में ‘आगम' शब्द का प्रयोग प्रायः निम्न तीन अर्थों में किया जाता है-
(1) कुल आगम, (2) औसत आगम तथा (3) सीमान्त आगम।
प्रश्न . स्थिर तथा परिवर्तनशील लागतों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - स्थिर तथा परिवर्तनशील लागतों में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं-
क्र. | अंतर का आधार | स्थिर लागत | परिवर्तनशील लागत |
1. | सम्बन्ध | स्थिर लागतों का सम्बन्ध अल्पकाल में उत्पादन के स्थिर साधनों से होता है। | परिवर्तनशील लागतों का सम्बन्ध अल्पकाल में परिवर्तनशील साधनों से होता है। |
2. | प्रभाव | उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन का स्थिर लागतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। | उत्पादन की मात्रा परिवर्तित होने पर परिवर्तनशील लागतें भी परिवर्तित हो जाती हैं। |
3. | उत्पादन बंद करने का प्रभाव | अल्पकाल में उत्पादन बन्द हो जाने पर भी स्थिर लागतें वहन करनी पड़ती हैं। | अल्पकाल में उत्पादन बन्द हो जाने पर परिवर्तनशील लागतें शून्य हो जाती हैं। |
4. | कुल लागत से सम्बन्ध | कुल लागत में से परिवर्तनशील लागतें घटानें पर स्थिर लागतें प्राप्त होती है। | कुल लागत में से स्थिर लागतें घटाने पर परिवर्तनशील लागतें प्राप्त होती है। |
अथवा
सीमान्त विश्लेषण में फर्म का साम्य समझाइए
MR = TRn - TRn-1
इसी प्रकार उत्पादित वस्तु की अन्तिम इकाई की लागत सीमान्त लागत होती है, अतः सीमान्त लागत होगी-
MC = TCn - TCn-1
सीमान्त विश्लेषण में फर्म के साम्य के लिए निम्नलिखित दो शर्तों का पूरा होना आवश्यक है-
(1) फर्म के साम्य के लिए पहली शर्त यह है कि सीमान्त आगम (MR) सीमान्त लागत (MC) के बराबर होना चाहिए। फर्म उसी स्थिति में अधिकतम लाभ प्राप्त करेंगी जब MR तथा MC बराबर होते हैं। इसका कारण यह है कि उत्पादन की एक निश्चित मात्रा पर जब फर्म का MR उसके MC से ज्यादा होता है (अर्थात् MR > MC) तो फर्म उत्पादन की मात्रा को और अधिक बढ़ाकर लाभ को बढ़ाने का प्रयास करती है अर्थात् फर्म साम्य की अवस्था में नहीं होती है । इसके विपरीत जब फर्म का सीमान्त आगम (MR) सीमान्त लागत (MC) से कम होता है (अर्थात्) (MR < MC) तो फर्म को हानि होती है तथा फर्म अपनी उत्पादन मात्रा को घटाती है अर्थात् फर्म इस स्थिति में भी साम्य की अवस्था में नहीं होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि उत्पादन की जिस मात्रा, पर फर्म की सीमान्त आगम तथा सीमान्त लागत बराबर होते हैं (अर्थात् MR = MC) वहीं पर फर्म साम्य की स्थिति में होती है। संक्षेप में, फर्म के साम्य के लिए पहली शर्त है कि उसका सीमान्त आगम उसकी सीमान्त लागत के बराबर हो। फर्म के साम्य के लिए यह शर्त या दिशा बाजार की सभी स्थितियों में लागू होती है चाहे वह पूर्ण प्रतियोगिता हो अथवा अपूर्ण प्रतियोगिता या एकाधिकार ।
(2) फर्म के साम्य के लिए दूरी आवश्यक शर्त यह है कि जिस बिन्दु पर सीमान्त आगम (MR) सीमान्त लागत (MC) के बराबर हो वहाँ पर सीमान्त लागत वक्र सीमान्त आगम वक्र को नीचे से काटे, इसका तात्पर्य यह है कि साम्य बिन्दु के पश्चात् सीमान्त लागत सीमान्त आगम से अधिक होनी चाहिए। इस शर्त के पूरे हुए बिना फर्म को अधिकतम लाभ की प्राप्ति नहीं हो सकती है। फर्म के साम्य की एक शर्त या दशा भी बाजार की सभी स्थितियों में लागू होती है चाहे पूर्ण प्रतियोगिता हो या अपूर्ण प्रतियोगिता अथवा एकाधिकार । इस प्रकार फर्म उत्पादन की उस मात्रा पर साम्य की स्थिति में होगी जहाँ पर कि (i) MR = MC तथा (ii) MC वक्र MR वक्र को नीचे से काटता है।
1. क्रेता व विक्रेताओं की अधिक संख्या- पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत बाजार में क्रेता तथा विक्रेता बड़ी संख्या में उपस्थित रहते हैं।
2. बाजार का पूर्ण ज्ञान- क्रेता तथा विक्रेता दोनों को बाजार का पूर्ण ज्ञान रहता है, इसलिए वह प्रचलित मूल्य पर ही वस्तु का क्रय-विक्रय करते हैं।
3. एक-रूप वस्तु- बाजार में एक समान वस्तु उपलब्ध रहती है। चाहे वह किसी भी उत्पादक के द्वारा उत्पन्न की जाए तथा वस्तु का प्रमाणीकरण होता है।
4. स्वतंत्र प्रवेश तथा बहिर्गमन- पूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों का प्रवेश तथा बहिर्गमन स्वतंत्र होता है तथा इसमें किसी प्रकार की बाधा या रुकावट नहीं होती है।
प्रश्न . वस्तु के गुण बाजार के विस्तार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं ?
उत्तर- वस्तु के गुण बाजार के विस्तार को निम्नलिखित रूप से प्रभावित करते हैं-
1. वस्तु की माँग- जिन वस्तुओं की उपयोगिता अधिक होती है तथा जिनकी माँग ज्यादा होती है। उन वस्तुओं का बाजार भी विस्तृत होता है। जैसे- सोना-चाँदी का बाजार।
2. वहनीयता- जिन वस्तुओं का भार कम तथा मूल्य अधिक होता है उनका बाजार विस्तृत हेता है, क्योंकि इन वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से लाया ले जाया जा सकता है तथा इस प्रकार की वस्तुओं में परिवहन व्यय कम लगता है।
3. टिकाऊपन- जो वस्तुएँ टिकाऊ होती हैं, उनका बाजार विस्तृत होता है तथा जो वस्तुएँ शीघ्र नष्ट होने वाली होती हैं, उनका बाजार संकुचित होता है।
4. स्थानापन्न वस्तुएँ- जिन वस्तुओं की स्थानापन्न वस्तुएँ प्रचलित रहती हैं, उनका बाजार सीमित रहता है, किन्तु जिन वस्तुओं की स्थानापन्न वस्तुओं का अभाव रहता है, उनका बाजार विस्तृत हो जाता है।
प्रश्न . पूर्ण प्रतियोगिता तथा अपूर्ण प्रतियोगिता में अन्तर लिखिए।
उत्तर- पूर्ण प्रतियोगिता तथा अपूर्ण प्रतियोगिता में अन्तर-
क्र. | आधार | पूर्ण प्रतियोगिता | अपूर्ण प्रतियोगिता |
1. | क्रेता-विक्रेता की संख्या | इसमें क्रेताओं तथा विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है। | इसमें विक्रेता की तुलना में क्रेता अधिक होते हैं। |
2. | मूल्य का ज्ञान | पूर्ण प्रतियोगिता में क्रेता तथा विक्रेता दोनों को मूल्य की जानकारी रहती है। | इसमें क्रेता को मूल्य की जानकारी नहीं होती है। |
3. | वस्तु का मूल्य | बाजार में एक समय में वस्तु का एक ही मूल्य होता है। | इसमें मूल्य अलग-अलग हो सकता है। |
4. | वस्तु में समानता | इसमें वस्तुएँ एक समान होती है। | इसमें वस्तुओं में समानता नहीं पाई जाती है। |
प्रश्न . पूर्ण प्रतियोगिता एवं एकाधिकार में अंतर लिखिए।
उत्तर- पूर्ण प्रतियोगिता एवं एकाधिकार में निम्नलिखित अन्तर हैं-
क्र. | आधार | पूर्ण प्रतियोगिता | एकाधिकार |
1. | क्रेता- विक्रेता की संख्या | बाजार में क्रेता एवं विक्रेताओं की संख्या अधिक रहती है। | क्रेता एवं विक्रेता अपेक्षाकृत कम संख्या में रहते है। |
2. | प्रतियोगिता | इसमें क्रेता एवं विक्रेताओं के बीच स्वतंत्र प्रतियोगिता रहती है। | इसमें क्रेता और विक्रेताके बीच स्वतंत्र प्रतियोगिता का अभाव रहता है। |
3. | उत्पत्ति के साधनों की गतिशीलता | उत्पत्ति के साधनों में पूर्ण गतिशीलता रहती है। | उत्पत्ति के साधनों में आंशिक गतिशीलता रहती है। |
4. | वस्तु का मूल्य | वस्तु का एक ही मूल्य रहता है। | एकाधिकार में मूल्य विभेद सम्भव होता है। |
प्रश्न . पूर्ण प्रतियोगिता का अर्थशास्त्र में अध्ययन क्यों आवश्यक है?
उत्तर- पूर्ण प्रतियोगिता कल्पना मात्र है, क्योंकि पूर्ण प्रतियोगिता की एक भी विशेषता तथा मान्यतायें व्यावहारिक जीवन में अंश मात्र भी नहीं पाई जाती हैं। ऐसी स्थिति में अर्थशास्त्र में इसका अध्ययन क्यों किया जाता है ? पूर्ण प्रतियोगिता काल्पनिक होते हुए भी अर्थशास्त्र में इसका अध्ययन इसलिए आवश्यक है कि व्यावहारिक जीवन में पाई जाने वाली अपूर्ण प्रतियोगिता को समझने के लिए पूर्ण प्रतियोगिता का अध्ययन जरूरी है। उदाहरण के लिए, जिस प्रकार वायुयान हवा में उड़ता है, किन्तु हवा में उड़ान भरने के पूर्व चालक को प्रशिक्षण जमीन पर खड़े वायुयान से दिया जाता है तथा पहले जमीन पर ही वायुयान को रेंगना सिखाया जाता है। पूर्ण प्रशिक्षण के पश्चात् ही उसकी उड़ान भरी जा सकती है। इसी प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता के अध्ययन से अपूर्ण प्रतियोगिता का अध्ययन सरल हो जाता है।
प्रश्न . राष्ट्रीय सम्पत्ति से क्या आशय है? राष्ट्रीय सम्पत्ति के प्रमुख अंग कौन-कौन से हैं?
उत्तर- राष्ट्रीय सम्पत्ति से आशय- एक निश्चित समय पर एक देश के सभी भौतिक वस्तुओं का योग उस राष्ट्र की सम्पत्ति कहलाती है। इसमें देश की भूमि तथा उसकी उर्वरता, खनिज संसाधन फैक्ट्रियाँ, मशीनें, वस्तुओं का स्टॉक, भवन, निवासियों की व्यक्तिगत प्रतिभाएँ आदि शामिल रहती हैं। राष्ट्रीय सम्पत्ति के अंग निम्नलिखित हैं-
1. प्राकृतिक संसाधन- प्रकृति द्वारा प्रदान किये गये सभी नि:शुल्क साधनों को राष्ट्रीय सम्पत्ति में रखा जाता है, जैसे- भूमि, वन, जल, उर्वरता, पर्वत, पशु आदि।
2. सार्वजनिक भौतिक परिसम्पत्तियाँ- राष्ट्रीय सम्पत्ति सभी प्रकार की सार्वजनिक, भौतिक परिसम्पत्तियों जैसे- सड़के, नहरें, भवन आदि को शामिल किया जाता है।
3. श्रम शक्ति - देश में मानव संसाधन बहुत महत्वपूर्ण होता है तथा श्रम उत्पादन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन होने के कारण इसे राष्ट्रीय सम्पत्ति में शामिल किया जाता है।
4. स्थिर पूँजी- एक देश में मशीनें, उपकरण, परिवहन के साधन, संचार, विद्युत आदि को राष्ट्रीय सम्पत्ति का अंग माना जाता है।
5. स्टॉक- स्टोरों में रखा कच्चा माल, तैयार माल आदि को राष्ट्रीय सम्पत्ति में शामिल करते हैं।
प्रश्न . सकल घरेलू उत्पाद समझाइए एवं उसकी विशेषताएँ बतलाइए।
उत्तर- सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.)- एक देश की घरेलू सीमा में एक वर्ष में उत्पादित समस्त अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य का योग सकल घरेलू उत्पाद या G.D.P. कहलाता है।
विशेषताएँ-
(1) सकल घरेलू उत्पाद के मूल्य में दोहरी गणना से बचने के लिए केवल अंतिम वस्तुओं व सेवाओं के मूल्य को ही जोड़ा जाता है।
(2) पुरानी वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त राशि इसमें नहीं जोड़ी जाती है।
प्रश्न . राष्ट्रीय आय के आकलन में कौन-कौन सी सावधानियाँ रखना चाहिए ?
उत्तर- राष्ट्रीय आय की गणना करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान रखना चाहिए-
(1) पुरानी वस्तुओं के विक्रय से प्राप्त आय को इसमें शामिल नहीं करना चाहिए।
(2) आकस्मिक आय जैसे- लाटरी इत्यादि से प्राप्त आय शामिल नहीं करना चाहिए।
(3) गैर कानूनी आय जैसे- ज़ामाखोरी की आय इसमें शामिल नहीं की जाती है।
(4) हस्तांतरण भुगतान नहीं जोड़ना चाहिए।
(5) अंश, ऋण-पत्र बाण्ड का विक्रय आदि को राष्ट्रीय आय में नहीं जोड़ना चाहिए।
(6) स्वयं उपभोग हेतु उत्पादन का मूल्य राष्ट्रीय आय में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
प्रश्न . भारत में राष्ट्रीय आय की वृद्धि हेतु कोई पाँच सुझाव दीजिए।
उत्तर- भारत में राष्ट्रीय आय को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जाने चाहिए-
1. जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण- भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ने के कारण प्रति व्यक्ति आय कम होती है व राष्ट्रीय आय में वृद्धि नहीं हो पाती है, आवश्यकता यह है कि देश के नागरिकों को शिक्षित किया जाये व उन्हें जनसंख्या वृद्धि के गंभीर परिणामों से अवगत कराया जाये।
2. कृषि विकास के प्रयास- भारत एक कृषि प्रधान देश है, हमारे देश की राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान सबसे अधिक है लेकिन देश में आज भी परम्परागत तरीके से कृषि कार्य किया जाता है, जिससे उपज काफी कम प्राप्त होती है। यदि कृषि का आधुनिकीकरण किया जाए तो कृषि उपज में वृद्धि होगी और देश की राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि होगी।
3. बचत वृद्धि को प्रोत्साहन- देश की जनता में बचत के प्रति जागरूकता व पूँजी निर्माण में वृद्धि के प्रयास सरकार के द्वारा किये जाने चाहिए, जिससे अधिक उत्पादन किया जा सके। जब उत्पादन अधिक होगा तो रोजगार भी अधिक लोगों को मिलेगा, जिसके परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी।
4. उद्योगों को प्रोत्साहन- सरकार की औद्योगिक नीति इस प्रकार की होना चाहिए कि जिससे कुल उत्पादन में वृद्धि की जा सके तथा सरकार ने साहसी को प्रोत्साहित करना चाहिए, इसके लिए देश में आर्थिक स्थिरता का वातावरण निर्मित करना चाहिए तथा उत्पादन के कार्य के लिये कम ब्याज एवं ऋण व साख सुविधाएँ उपलब्ध कराना चाहिए।
5. प्राकृतिक साधनों का संतुलित विदोहन- देश में उपलब्ध प्राकृतिक साधनों का विवेकपूर्ण तरीके से विदोहन करना चाहिए, जिससे उनका लम्बे समय तक पूर्ण उपयोग किया जा सके।
प्रश्न . राष्ट्रीय आय के महत्व को किन्हीं चार बिन्दुओं में समझाइए।
उत्तर- राष्ट्रीय आय का महत्व निम्नलिखित हैं-
1. आर्थिक प्रगति की जानकारी- किसी देश की आर्थिक प्रगति की जानकारी का अनुमान राष्ट्रीय लेखों से आसानी से लगाया जा सकता है। देश की अर्थव्यवस्था ने एक निश्चित समय में कितनी प्रगति की है तथा किन क्षेत्रों में विकास कार्य अधूरा है इन सब बातों की जानकारी राष्ट्रीय लेखों से मिलती
2. राष्ट्रीय आय के वितरण का ज्ञान- राष्ट्रीय लेखे इस बात की जानकारी प्रदान करने में सहायक होते हैं कि राष्ट्रीय आय का वितरण विभिन्न वर्गों में किस प्रकार हो रहा है अगर वितरण में असमानता या दोष है तो उन्हें दूर करने के प्रयास किए जा सकते हैं।
3. नीति निर्धारण में सहायक- व्यावसायिक दृष्टि से विभिन्न फर्मों को इस बात में रुचि रहती है कि वे जिस उद्योग का अंग है उसका उत्पादन कितना है तथा कुल उत्पादन में इसका कितना भाग है इसी लेखांकन से हमें यह भी जानकारी मिलती है कि राष्ट्रीय आय का व्यय किस प्रकार हो रहा है किन वस्तुओं का बाजार बढ़ रहा है तथा किन वस्तुओं की माँग घट रही है जिससे भावी नीति निर्धारण में मदद मिलती है।
4. श्रम संघों के लिए महत्व- राष्ट्रीय आय का लेखा श्रम संघों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है उन्हें इससे इस बात की जानकारी मिलती है कि राष्ट्रीय आय में उनका योगदान कितना है तथा प्रतिफल के रूप में कितना अंश प्राप्त हो रहा है।
5. अन्य संघों के लिए महत्व- राष्ट्रीय आय के अनुमान विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति की तुलना करने में सहायक होते हैं। अन्य अर्थव्यवस्थाओं की प्रगति का मूल्यांकन करके एक अर्थव्यवस्था अपने विकास कार्यक्रम उचित प्रकार से बना सकती है।
प्रश्न .न्यून माँग का सिद्धान्त' क्या है?
उत्तर- न्यून माँग का सिद्धान्त- यह सिद्धान्त केन्स द्वारा 'सामान्य सिद्धान्त' के रूप में प्रतिपादित किया गया। उनके अनुसार अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी का कारण प्रभावपूर्ण माँग में कमी होना है। जब समाज में सभी लोग अपनी सम्पूर्ण आय को व्यय कर देते हैं तो अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है तथा बेरोजगारी नहीं पायी जाती है। परन्तु अर्थव्यवस्था में आय व व्यय कभी बराबर नहीं होते हैं, क्योंकि लोग अपनी आय में से कुछ बचत कर लेते हैं। परिणामस्वरूप बेरोजगारी उत्पन्न हो जाती है उनके अनुसार इस बेरोजगारी को प्रभावपूर्ण माँग में वृद्धि करके कम किया जा सकता है।
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